मर्त्य मानव के विजय का तुर्य हूँ
उवर्शी अपने समय का सूर्य हूँ
अंधतम के भाल पर पावक जलाता हूँ
बादलों के शीश पर स्यंदन चलाता हुँ,
पर न जाने बात क्या है
इन्द्र का आयुध पुरुष जो झेल सकता है
सिंह से बांहे मिलाकर खेल सकता है
फूल के आगे वहीं असहाय हो जाता
शक्ति के रहते हुऐ निरुपाय हो जाता
बिध हो जाता सहज बंकिम नयन के वाण से
जीत लेती रुपसी नारी उसे मुस्कान से
मै तुम्हारे बाण का बींधा हुआ खग
वक्ष पर घर शीश मरना चाहता हूँ
मै तुम्हारे हाथ का लीला कमल हूँ
प्राण के सर में उतरना चाहता हूँ।।
दिनकर
Sunday, April 20, 2008
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